गरियाबंद / देवभोग:
देशबन्धु नेताम
एक तरफ जहां देश आजादी का अमृत काल मना रहा है और डिजिटल क्रांति से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी धमक जमा रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के सीमांत क्षेत्र गरियाबंद जिले के देवभोग ब्लॉक स्थित खोकसरा गांव से एक कड़वी और व्यथित करने वाली सामाजिक सच्चाई सामने आ रही है। यहां आज के आधुनिक युग में भी ‘अष्टपारी’ नाम से जाने जाने वाले अनुसूचित जाति (SC) समुदाय के लोग सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव और छुआछूत जैसी कुप्रथाओं का सामना करने को मजबूर हैं।
परंपरा के नाम पर भेदभाव का दंश
खोकसरा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में वर्षों से चली आ रही संकीर्ण सामाजिक मान्यताओं के कारण अष्टपारी समाज के परिवारों को दैनिक जीवन में कदम-कदम पर अपमानित होना पड़ता है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, सार्वजनिक स्थानों, धार्मिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों में इस समाज के लोगों के लिए अलग व्यवस्था रखी जाती है।
गांव के चाय-नाश्ते की दुकानों और सार्वजनिक स्थलों पर आज भी पुराना ढर्रा देखने को मिलता है। बर्तन अलग रखना, पानी के स्रोतों पर प्राथमिकता न मिलना और मांगलिक कार्यों में बराबरी का दर्जा न देना जैसी प्रथाएं दबे पांव अब भी जारी हैं।
संवैधानिक अधिकारों पर प्रथाओं का हावी होना
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 स्पष्ट रूप से अस्पृश्यता (छुआछूत) का उन्मूलन करता है और इसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध घोषित करता है। ‘अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ जैसे कठोर कानून होने के बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि सामाजिक ताने-बाने और आपसी दबाव के कारण पीड़ित वर्ग खुलकर सामने आने से हिचकिचाता है।
अष्टपारी समाज के युवाओं का कहना है कि वे पढ़-लिखकर आगे बढ़ना चाहते हैं और समाज की मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं, लेकिन गांव का सामाजिक माहौल उन्हें पुरानी बेड़ियों में ही बांधकर रखना चाहता है। यदि कोई युवा इस भेदभाव का विरोध करता है, तो उसे अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक दूरी या बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।
प्रशासनिक उदासीनता और जागरूकता की कमी
देवभोग क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस प्रकार की कुप्रथाओं का मुख्य कारण जनजागरूकता की भारी कमी और प्रशासनिक निगरानी का अभाव है। यद्यपि प्रशासन द्वारा समय-समय पर समरसता शिविर और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर उनका प्रभाव नगण्य दिखाई देता है।
स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग को इस विषय पर कड़ा रुख अपनाने की आवश्यकता है। केवल कानून बना देना ही काफी नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार चौपाल लगाकर लोगों को मानसिक रूप से जागरूक करना होगा ताकि सदियों पुरानी इस मानसिकता को बदला जा सके।
बदलाव की सख्त जरूरत
किसी भी सभ्य समाज के लिए छुआछूत और जातीय भेदभाव एक कलंक के समान है। खोकसरा का यह मामला न केवल प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े करता है, बल्कि हमारे सामाजिक चिंतन पर भी एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।
अष्टपारी समाज के लोगों की मांग है कि:
कड़े कदम: शासन-प्रशासन गांव में जाकर जमीनी स्थिति की समीक्षा करे और भेदभाव करने वाले तत्वों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करे।
सामाजिक समरसता अभियान: राजस्व और पुलिस विभाग की संयुक्त टीम द्वारा गांव में सामाजिक समरसता बैठकें आयोजित की जाएं।
युवाओं का सशक्तिकरण: अष्टपारी समाज के युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन यापन के विशेष अवसर उपलब्ध कराए जाएं।
जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति बराबरी और सम्मान के साथ जीवन नहीं जी पाता, तब तक विकास के तमाम दावे अधूरे ही रहेंगे। खोकसरा के अष्टपारी समाज को आज सहानुभूति की नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों और न्याय की जरूरत है।



