अंबिकापुर. जानकारी एवं जागरूकता के अभाव में एक और माँ-बच्चे की जान चली गई. सरगुजा जिले के लखनपुर विकासखंड अंतर्गत सकरिया गांव में 6 जुलाई को गर्भवती सुखनी मझवार (पत्नी दिनेश मझवार) और उनके बच्चे की घरेलू प्रसव के दौरान मौत हो गई. स्वास्थ्य विभाग की तैयारी और जागरूकता अभियान पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं.
दिनेश मझवार तमिलनाडु में कार्य करते थे और 14 जून को घर लौटे थे. उनकी पत्नी सुखनी 8 महीने की गर्भवती थीं। 21 जून को उन्हें महिला स्वास्थ्य केंद्र कुन्नी ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें एनीमिया (खून की कमी) और हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत बताई. डॉक्टरों ने आयरन शुक्रोज़ इंजेक्शन के साथ अंबिकापुर जिला अस्पताल जाने की सलाह दी थी. ग्राम की मितानिन और अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने भी बार-बार अस्पताल ले जाने की हिदायत दी थी.
हालांकि सुखनी ने अस्पताल जाने से इनकार कर दिया और घर पर ही प्रसव कराने की जिद की. 6 जुलाई को प्रसव के दौरान दर्द बढ़ने पर स्थानीय सुंइन दाई ने घरेलू प्रसव कराया, लेकिन इस दौरान दोनों माँ और बच्चे की मौत हो गई। परिजनों का कहना है कि भारी बारिश और अचानक प्रसव शुरू होने के कारण उन्हें अस्पताल नहीं ले जा सके.
स्वास्थ्य विभाग पर उठे सवाल
मृतका के परिजनों ने गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने बताया कि :
जांच पर्ची में हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने वाली कोई दवा नहीं लिखी गई.
मितानिन और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के आने-जाने की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी.
पंचनामा करने के लिए स्वास्थ्य कर्मचारी तेजी से पहुंचे, लेकिन समय रहते उचित मार्गदर्शन और निगरानी कहाँ थी..?
स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि यदि स्वास्थ्य विभाग ने महिला को जिला अस्पताल भेजने में उतनी ही तेजी दिखाई होती, जितनी पंचनामा भरने में दिखाई, तो शायद यह दर्दनाक घटना टाली जा सकती थी
विशेष संरक्षित जनजाति का मामला
यह घटना विशेष संरक्षित मझवार जनजाति से जुड़ी होने के कारण और भी गंभीर है. शासन-प्रशासन सुरक्षित मातृत्व (Institutional Delivery) को बढ़ावा देने के लिए लगातार अभियान चला रहा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी हकीकत अलग है. अनेक महिलाएं अभी भी घरेलू प्रसव पर निर्भर हैं, जहां न प्रशिक्षित डॉक्टर होते हैं और न ही उचित चिकित्सा सुविधा.
सवालों का ढेर
क्या स्वास्थ्य विभाग ने उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिला की नियमित निगरानी की..?
मितानिन-आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका कितनी प्रभावी रही..?
जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में क्यों घरेलू प्रसव हो रहे हैं..?
क्या यह सिर्फ एक दुर्घटना है या व्यवस्थागत लापरवाही का उदाहरण..?
इस मामले में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को जवाब देना चाहिए. प्रशासन से मांग है कि न केवल पंचनामा कार्यवाही पूरी की जाए, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं. समय रहते उचित मार्गदर्शन, नियमित जांच और जागरूकता अभियान ही माँ-बच्चे की जान बचा सकते हैं.




