रायपुर/अंबिकापुर. छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बार फिर सवालों का सैलाब उमड़ पड़ा है. अंबिकापुर के लुंड्रा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक प्रबोध मिंज की हालिया बीमारी ने न केवल राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि सोशल मीडिया पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा है. स्थानीय मेडिकल कॉलेज अस्पताल को छोड़कर राजधानी रायपुर के निजी रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल में इलाज कराने का फैसला ‘दोहरी नैतिकता’ का प्रतीक बन गया है. जहां नेता निजी सुविधाओं का लुत्फ उठा रहे हैं, वहीं आम जनता सरकारी अस्पतालों की बदहाली से जूझ रही है. सवाल उठ रहा है – अगर सरकारी अस्पताल इतने ही मजबूत हैं, तो नेता क्यों निजी चले जाते हैं.? यह घटना व्यवस्था की पोल खोलने वाली साबित हो रही है.
घटना का पूरा ब्योरा : पेट-सीने के दर्द से शुरू हुई विवादास्पद यात्रा
9 दिसंबर को लुंड्रा विधायक प्रबोध मिंज को अचानक पेट और सीने में तेज दर्द हुआ. स्थानीय स्तर पर प्रारंभिक जांच के बाद उन्हें तुरंत रायपुर शिफ्ट कर दिया गया. अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल – जो सरकारी स्तर पर एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र है – को नजरअंदाज कर सीधे रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया. अस्पताल प्रशासन के अनुसार, मिंज का स्वास्थ्य अब स्थिर है और वे खतरे से बाहर हैं. लेकिन यह फैसला जनता को हजम नहीं हो रहा. सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें और वीडियो दिखाते हैं कि स्वास्थ्य मंत्री, पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े, जनजातीय कल्याण मंत्री केदार कश्यप और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह जैसे वरिष्ठ नेता अस्पताल पहुंचे. उन्होंने मिंज से मुलाकात की, उनका कुशलक्षेम पूछा और शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की.
ये तस्वीरें – जहां नेता निजी अस्पताल के लग्जरी वार्ड में मुस्कुराते नजर आ रहे हैं – आम लोगों के लिए नमक लगाने वाली साबित हुईं. एक फेसबुक पोस्ट पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई: “माननीय विधायक जी का इलाज सरकारी अस्पताल में क्यों नहीं करवाते.?” एक यूजर ने लिखा, “जो अस्पताल नेता नहीं जाते, वहां जनता क्यों जाए.? भरोसा टूट गया है, अस्पताल नहीं.” यह सवाल अब #NetasPrivateHospitals और #ChhattisgarhHealthCrisis जैसे हैशटैग के साथ वायरल हो रहा है.
सोशल मीडिया पर आग : जनता का गुस्सा और सिस्टम पर तंज
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर यह मुद्दा आग की तरह फैल गया है. ट्विटर (अब X) और फेसबुक पर सैकड़ों पोस्ट्स में लोग सरकार की स्वास्थ्य नीतियों पर सवाल ठोक रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, “अंबिकापुर में करोड़ों खर्च कर मेडिकल कॉलेज बनाया, लेकिन विधायक को भरोसा नहीं..? जनता की किस्मत तो सरकारी अस्पतालों पर ही अटकी है.” एक अन्य पोस्ट में वायरल हो रही मीम दिखाती है – एक तरफ नेता निजी अस्पताल में आराम फरमा रहे हैं, दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में मरीज खाट पर लादकर 7 किलोमीटर पैदल चल रहे हैं.
यह विवाद नया नहीं है. छत्तीसगढ़ में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियां लंबे समय से उजागर हो रही हैं. सरगुजा जिले के मनेंद्रगढ़ में हाल ही में एक गर्भवती महिला को कांवड़ पर 7 किलोमीटर ढोकर अस्पताल पहुंचाया गया, क्योंकि एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं थी. अंबिकापुर जैसे शहरों में भी डॉक्टरों की कमी, दवाओं का अभाव और बुनियादी सुविधाओं की किल्लत आम बात है. राज्य सरकार ने 2025-26 के बजट में स्वास्थ्य पर 15% वृद्धि का दावा किया है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है.
सिस्टम की जड़ें : क्यों टूट रहा भरोसा..?
मामले की जड़ सरकारी अस्पतालों पर जनता का खोता विश्वास है. छत्तीसगढ़ में 300 से अधिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) हैं, लेकिन इनमें से आधे से ज्यादा में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं. अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज – जो 500 बेड वाला प्रमुख संस्थान है – अक्सर ओवरलोड रहता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में प्रति 10,000 लोगों पर मात्र 5 डॉक्टर उपलब्ध हैं, जो राष्ट्रीय औसत से 30% कम है.
नेताओं का निजी अस्पतालों पर भरोसा इस भरोसे को और तोड़ता है. एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “नेता चुनावी वादों में सुविधाएं गिनाते हैं, लेकिन खुद निजी चले जाते हैं. यह दोहरा चरित्र है.”
यह घटना छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था को आईना दिखा रही है. जहां निजी अस्पतालों की चकाचौंध नेताओं को लुभा रही है, वहीं सरकारी सिस्टम की लचक आम जनता को तोड़ रही है. सवाल वही है – भरोसा टूटा अस्पताल नहीं. अगर नेता सरकारी अस्पतालों को मजबूत बनाने के लिए कदम नहीं उठाएंगे, तो जनता का गुस्सा और भड़केगा. समय है कि व्यवस्था जागे, वरना यह सवाल चुनावी हार का सबब बन सकता है.



